Wednesday, 12 November 2025

रजनी: प्रथम भेंट

भाग 1 : पहली मुलाक़ात — जब नयनों ने कहा सब कुछ 

(प्रथम भेंट)

वो दिन जैसे ठहर गया था,
समय ने साँसें रोक लीं,
रजनी थी मौन, निस्तब्ध लम्बी रात सी,
कुछ कहने को था लम्बा मौन, न कोई बात थी ?

अनिल वहाँ खुला हुआ था -
जैसे जीवन की किताब रखी हो,
हर पन्ना सच्चाई से भरा,
हर शब्द में उजली रेखा लिखी हो।

रजनी बस सुनती रही चुपचाप,
जग जैसे दूर कहीं ठहर गया,
मन भीतर कुछ काँपा-सा,
पर होंठों ने कोई स्वर न कहा।

अनिल ने तर्क नहीं, भाव चुना,
दिमाग़ की जगह दिल को सुना,
न गिने लाभ, न हानि की रेखा,
आँखों में बस अपनापन देखा।

रजनी सोच न सकी, पर समझ गई,
यह मौन कोई सामान्य नहीं,
यह वो क्षण था जहाँ आत्मा बोली,
और समय भी बना साक्षी वहीं।

फूलों ने उस दिन खुशबू छोड़ी,
जैसे गवाही दे रहे हों भाव,
अनिल के शब्दों से नहीं - नज़रों से,
रजनी के मन ने पा लिया ठाँव।

वो पहली मुलाक़ात न कहानी बनी,
न किसी किताब में लिखी गई,
पर उसकी छाया आज भी है गहरी,
जैसे आरती में लौ रहती है ठहरी।

रजनी का मौन — प्रार्थना बन गया,
अनिल की वाणी — उत्तर बन गई,
और वहीं से जन्मा वो पवित्र प्रेम -
जहाँ आत्मा से आत्मा जुड़ गई।


अनिल आर्य...

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