“पिता और पुत्री —का अखंड अटूट प्रेम”
रजनी थी त्रि-रत्नों में प्रियतम — जैसे चाँद सितारों में एक,
रणधीर सिँह की आँखों का नूर — रजनी से था प्रेम विशेष।
दिन बढ़ते, संघर्ष बढ़ा — पर न डगमगाया कभी विश्वास,
पिता का स्नेह बना संबल — अंधकार में भी न खोई आस।
नज़रें हटती नहीं कभी — चिंता जैसे छाँव बनी,
रजनी ज्यों दूर हुई — रणधीर जी की धड़कन जमी।
जब कन्यादान का क्षण आया — मन था गदगद, आँखें नम,
अनिल आर्य को सौंप दिया — जीवन का सबसे सुंदरतम धन।
बिन बात किए जो चैन न पाते — दिन में कई बार पुकार,
हर संवाद में झरता रहता — रजनी पर अपार प्यार।
फिर नन्ही परी जब आई — अनायरा, मुस्कान नई,
रणधीर जी को रजनी से भी प्यारी — बस लगी थी यही।
हर सुबह का पहला सुख अब — वह नन्ही हँसी किलकार,
मानो रजनी का बचपन फिर — गोद में आके पाता प्यार।
खुशियों को लगी नज़र —भाग्य ने फिर खेला दाँव,
पिता की तबियत बिगड़ी — पड़ी फीकी बरगद की छाँव।
फिर वो घड़ी भी आई — जब साथ अचानक छूट गया,
जीवन का सबसे पावन नाता — रजनी से एकदम टूट गया।
क्षण भर में सब उजड़ गया — वो साया, वो शांति, वो छाँव,
मन जीने को न था, पर — लगानी थी पार परिवार की नाँव।
हर पल यादों में डूबी रहीं — हर साँस में रटती नाम,
पिता गए, रजनी के मन — न भाता कोई भी काम।
जो चला गया, वो रूप बदल — फिर जीवन में लौट आया,
रजनी की गोद में मुस्काता — अब शिवा कहलाया।
ऐसा स्नेह कहाँ मिलता है — जो मृत्यु से भी पाता पार,
रजनी के जीवन में अब — शिवा को मिलता प्यार अपार।
एक दीया ऐसा भी हो — जो इस प्रेम का फैलाए अखंड प्रकाश,
बतलाए जग को पिता का स्नेह— पुत्री का अमर, अटूट, विश्वास।
अनिल आर्य...
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