भाग 2 : रजनी — प्रेम का संकल्प (संघर्ष और समर्पण)
पहली मुलाक़ात के उस मौन से,
जब नयन बोले, शब्द चुप थे,
शुरू हुआ था प्रेम का अंकुर —
जो आस्था के आँगन में रूपधन्य था।
रजनी — संकोच की स्याही में डूबी,
डरते-काँपते मन से आगे बढ़ी,
पर दिल ने कहा — “यह राह अनिल की है,
यही तो मेरी नियति की कड़ी।”
धीरे-धीरे मिलने लगे फिर दोनों,
हर बात में खिली नई सुबह,
न दिखावा, न वचन का बोझ,
बस विश्वास की निर्मल परछाई बनी वह।
अनिल की हँसी में जीवन की लय,
रजनी की आँखों में समर्पण की छाया,
दोनों के बीच जो मौन बहता,
वही प्रेम का शुद्ध सरस साया।
फिर वो दिन आया — जैसे स्वप्न साकार,
जब दो कुल हुए एक आधार,
शुभ वचन, मंगल ध्वनि, आशीषों की छाँव,
रजनी–अनिल का प्रेम बना परिवार की ठाँव।
अनिल के जीवन में भी संघर्ष था,
सपनों की ऊँचाई, पर राह में काँटे,
कितनी तैयारी, कितनी मेहनत —
फिर भी अंधी रेवड़ी अपनों को बांटे।
वो दिन थे कठिन — सपनों की डगर पर काँटे थे,
हर दिन वो दुःख रजनी ने मिलकर बांटे थे,
वो चाहता था रहना अपने जनों के पास,
माता-पिता का साथ, सेवा में विश्वास,
पर भ्रष्ट व्यवस्था के इस अंधकार में,
हर योग्यता हारती रही, न रही आस भी पास।
फिर भी अनिल ने हिम्मत न हारी,
दिल में निष्ठा, आँखों में उजियारा,
कहा — “ईश्वर की लेखनी धीमी सही,
पर चलना ही है धर्म हमारा।”
उधर रजनी का साहस था, एक अग्नि की ज्वाला,
अंदर पले भविष्य, पर मन अडिग, अटल, उजाला।
डॉक्टर बनने का सपना, आँखों में बसाए,
थकन, वेदना सब भूल, ज्ञान के दीप जलाए।
कुछ भी हुआ रजनी ने अपने पंख न मोड़े,
कठिन दिनों में भी शिक्षा की लौ न छोडे,
गर्भ में कली-पली - प्रेम की नन्ही लय,
और मन में डॉक्टर बनने का अटल ध्येय।
आख़िरी दिन तक किताबें खोली,
थकान में भी आत्मा बोली —
“माँ बनूँगी, पर अपने कर्म से,
उसके भविष्य की नींव रखूँगी।”
अनायरा आई — आँखों में आँसू,
हृदय में ममता, बाँहों में प्रेम,
पर रजनी फिर भी कॉलेज गई,
हर दिन उसे मन में लिए - नेम।
हर सुबह निकलती कॉलेज को, बेटी को छोड़ पीछे,
ममता की धारा भीतर बहती, दृढ़ निश्चय सींचे।
रात को जब लौटती थी, आँचल में भर लेती उसे,
माँ की गोद में थकन घुलती, आशीष बनती हृदय में।
वो ममता जो रोके रखती,
और वो जिम्मेदारी जो आगे बुलाती,
दोनों के बीच रजनी चली -
जैसे दीपक आँधी में मुस्कराती।
हर व्याख्यान के साथ उसकी आँखों में,
एक प्रश्न चमकता था -
“क्या मेरी बेटी एक दिन मुझ पर गर्व करेगी?”
और उत्तर उसके कर्मों में लिखा था।
अनिल देखता रहा - उस तप की चमक,
जहाँ प्रेम, त्याग और संघर्ष एक हुए,
और समझा - यही तो है सच्चा व्रत,
जहाँ दो आत्माएँ जीवन से ऊपर उठें।
रजनी का प्रेम अब साधना था,
अनिल की निष्ठा उसका आधार,
संघर्षों में भी खिला यह प्रेम -
जैसे कीचड़ में कमल साकार।
अनिल ने भी रजनी की दृढ़ता को नमन किया,
हर कठिन मोड़ पर संग खड़ा, उसे प्रणाम किया।
सपनों का घर बनता गया ईमान की नींव से,
दोनों ने सींचा प्रेम अपना त्याग और पीर से।
यह कथा नहीं, प्रेरणा है -
जहाँ प्रेम ने जीवन को एक नया अर्थ दिया।
रजनी और अनिल - अब दो नहीं रहे,
मिलकर एक - पवित्र प्रेम की मूर्ति को साकार किया।
अनिल आर्य...
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