यह घर नहीं, मंदिर है,
जहाँ स्नेह दीप जलते हैं,
जहाँ हँसी बनकर हवा में
सपनों के पंख मचलते हैं।
प्रेम बसा है, हर कोने में,
जो परिवार का है आधार,
प्रेम अमर है, अविनाशी,
द्वेष हमें है, अस्वीकार।
पिता बिरेन्द्र सिँह — वटवृक्ष समान,
उनकी प्राणवायु से घर, रहे भरा,
उनकी छाँव से, मिट जाती थकान,
गुणशाली इतने, देवों को भी, दें हरा।
माँ सुदेश कुमारी, ममता सरिता,
थके मनों को देती विश्राम,
उनकी वाणी में, घर की गूँज,
उनकी सेवा से बनता हर काम।
अनिता संग, शक्ति का संग,
जीवन में सुख का नया रंग,
और नन्हा अयांश मुस्कराए,
घर में जैसे प्रभात उमंग।
रीतू की जोड़ी, योगी से जोड़ी,
हर दृष्टि में भरा, आशीर्वाद,
नई शुरुआत की यह कोमल-किरण,
भर दें जीवन में मधुर प्रसाद।
अमित को मिली मीत, रीतू से प्रीत,
बंधन स्नेह का अद्भुत और महान,
ये सुखद संयोग सभी बने हैं —
शिवा के शुभ कर्मों का है वरदान।
रजनी — मेरे जीवन की धड़कन,
संगिनी, सखा, स्नेह का रूप,
उसकी उपस्थिति जैसे दीपक,
मिटे अंधकार, मिले स्नेहिल धूप।
अनायरा और पावनी हैं तारे,
घर में झिलमिलाते करते हैं सारे,
उनकी हँसी में मिलता प्रेम-प्रसाद,
बोल हैं ऐसे, जैसे ईश्वर के मीठे संवाद।
और शिवा है नन्हा-प्यारा,
मुस्काता उससे घर सारा,
सबका मन हरदम बहलाता,
आशा का सूरज कहलाता।
यह परिवार, यह स्नेह-बंधन,
हर रग-रग में बसा प्रेम अपार,
यही मेरा धर्म, यही उत्सव,
यही मेरा, आर्य परिवार।
अनिल आर्य...
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