(अनायरा, पावनी और अंत में शिवा के साथ प्रेम की पूर्णता)
वो प्रेम नहीं था क्षणिक आकर्षण,
वो था जीवन का निर्मल सत्य,
जहाँ रजनी की आँखों में समर्पण था,
और अनिल की धड़कन में श्रद्धा का व्याकरण।
धीरे-धीरे बढ़े कदम दोनों के,
डरते, सँभलते, पर सच्चे,
हर मुलाक़ात में कुछ नया खिले-
जैसे वसंत खुद प्रेम बनकर मिले।
समय बीता, परिवार बना,
अनायरा की गूँजी किलकारी,
फिर पावनी आई — जैसे दूसरी भोर,
दो फूल खिले, माँ की ममता उमड़ी चहुँ और।
रजनी ने हँसते हुए सब सहा,
थकान भी प्रेम का व्रत बन गई,
हर बार ईश्वर को धन्यवाद कहा,
“तेरी देन से मेरी गोद भर गई।”
पर जीवन की सबसे कठिन घड़ी आई,
जब तीसरे सूरज - शिवा -को जग ने पुकारा,
तीसरे ऑपरेशन के दर्द तले भी
रजनी ने कहा — “मेरा बच्चा बस मुस्कराए जीवन सारा।”
वह दिन था जैसे तप का पर्व,
जहाँ माँ ने अपनी देह भुला दी,
और अनिल ने प्रार्थना में अपने आँसू छिपा लिए,
कि यह जन्म सिर्फ ईश्वर का लिखा हो,
कुछ छूट गया था, जैसे पुनः मिला हो।
और शिवा आया —
जैसे आकाश ने, धरती को चूमा हो,
हर पीड़ा बन गई पूजा,
जैसे बिछड़ा जन्मों का फिर मिलकर झूमा हो।
उसको पाने को, रजनी ने
स्वयं को अग्नि में तपाया,
अपना जीवन दाँव पर रख —
ममता का अमर दीप जलाया।
अनिल की आँखों में उस क्षण
श्रद्धा का सागर उमड़ा,
क्योंकि उसने देखा था —
कैसे प्रेम बनता है बलिदान का सूत्र।
आज भी जब शिवा की हँसी गूँजती है,
वो रजनी के उस व्रत का फल है,
जिसने प्रेम को पूजा बनाया,
और जीवन को एक महाकाव्य कर दिया।
यह कथा नहीं, आरती है —
जहाँ रजनी का प्रेम अनिल की आस्था बना,
और उस मिलन से जन्मा शिवा —
पवित्र प्रेम का साकार चमत्कार बना।
अब यह परिवार नहीं — एक आस्था का वृक्ष है,
रजनी उसकी जड़, अनिल उसका तना,
अनायरा-पावनी उसकी शाखाएँ,
और शिवा — उस वृक्ष का दिव्य फल बना।
रजनी का प्रेम अब ममता है,
अनिल की श्रद्धा अब आराधना है,
और यह घर — एक मंदिर है,
जहाँ प्रेम स्वयं भगवान बना।
जय हो उस रजनी के प्रेम की,
जिसने तीन बार दर्द सहा - और हर बार नव जीवन रचा।
यह प्रेम नहीं - यह सृष्टि की नीराजन-आरती है,
जो रूठ के चला गया था, तू दिन रात उसे पुकारती है,
विधाता ने सुनी तेरी पुकार, किया उपकार,
लोटाया सूद समेत, जो भगवन ने लिया,
पालनहार ने शिवा उपहार स्वरूप दिया।
अनिल आर्य...
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