Monday, 26 January 2026

मैं वैरागी वीतरागी...

मैं वैरागी वीतरागी

मैं वैरागी वीतरागी…
वैराग सही, वीतराग सही,
सन्मार्ग यही, शिव-तत्व यही,
उस चाल चलो, उस रंग ढलो,
जो पहुँचे हर को,
बदले मन के स्वर को।

मैं वैरागी वीतरागी…
नयन खुले, पर दृश्य शून्य,
चलता हूँ, पर राह नहीं,
ठहराव ही मेरा गंतव्य;
तन है नश्वर—जानो ईश्वर,
मोक्ष मन में उतरे, स्वर में निखरे,
गूँजे हर स्वर, हर-हर; हर-हर।

मैं वैरागी वीतरागी…
न चाह का शोर भीतर,
न भय की कोई परछाईं,
जो मिला, वह अर्पण हुआ,
जो छूटा, वह भी मेरा ही था;
मौन की धड़कन सुनता हूँ,
जहाँ शब्द स्वयं गल जाते हैं;
मैं सत्य वहाँ बुनता हूँ।

मैं वैरागी वीतरागी…
राग जला और द्वेष गला,
मोह को जल में विसर्जित किया,
जब “मैं” छूटा धीरे-धीरे,
अनंत ने मुझको थाम लिया;
न तृष्णा की अग्नि शेष रही,
न विरक्ति का कोई दंभ बचा;
तब मन ने नव संसार रचा।

मैं वैरागी वीतरागी…
समत्व की शांत धूप तले,
अंतर में हुई रौशनी उजली;
न त्याग का बोझ रहा कंधों पर,
न भोग की छाया मन पर टिकती —
मैं मुक्त हूँ…
क्योंकि अब,
उपेक्षा की परवाह नहीं,
अपेक्षा नहीं और चाह नहीं,
है यही राह सही, है यही राह सही...
मैं वैरागी वीतरागी… 

अनिल आर्य...

No comments:

Post a Comment