सबका मालिक पालनहारा,
सृजन करता—करता संहारा,
सृष्टि के कण-कण में वो है,
मेरे पल क्षण-क्षण में वो है।
सृष्टि पालक, नियंता है शिव,
सृजक–विध्वंसक, अभियंता है शिव,
आस - उम्मीद, विश्वास है शिव,
मेरी प्राण-वायु, श्वास है शिव।
वो ही अनादि, वो ही अनंता,
साधु है वो, वो ही संता,
भाग्य लिखता, मेल मिलाता,
सृष्टि के हर, खेल रचाता।
न रूप उसका, न ही नाम विशेषा,
न कोई आदि, न कोई शेषा,
जो शून्य में पूर्ण समाया,
वही स्वयंभू-शिव कहलाया।
पकड़े तेरा-मेरा सबका हाथ,
तो मैं कहता, जगन्नाथ।
डूबे जब जीवन की हर बात,
याद है आता जगन्नाथ।
टूटे जब विश्वास की डोर,
छूटे अपने, छूटे छोर,
तू ही अनाथों का है नाथ,
जगन्नाथ, जगन्नाथ।
हर आदियोगी में, महादेव है,
नहीं किसी भोगी में, महादेव है,
हैं भांग-धतूरा जो कोई खाते,
महादेव को कभी न पाते।
नहीं कश खींचे महादेव,
अंतर का विष खींचे महादेव,
जगत का सारा, संताप-ताप,
अमृत से सीँचे महादेव।
जब आकर दस्तक - देता काल,
याद करता मैं महाकाल,
काल का भी बन जाता काल,
टाल देता - मृत्यु अकाल।
जय महाकाल, जय महाकाल।
भय जब मन में, भरता जाल,
स्मरण करता मैं महाकाल,
भस्म कर देते सब विकाल,
टूटे बंधन, मिटे जंजाल।
जय महाकाल, जय महाकाल।
अंधियारा हो या भूचाल,
साथ खड़े रहते महाकाल,
श्वास-श्वास में उनका भाल,
रक्षक बनते, बनते ढाल।
जय महाकाल, जय महाकाल।
शरण जो आया इनके लाल,
क्या बिगाड़े उनका काल,
भक्त के संग खड़े महाकाल,
काल के आगे अड़े महाकाल,
जय महाकाल, जय महाकाल।
अधर्म बढ़े, आतंकी पे - हो शक्ति,
तब मैं रूद्र रूप की - करता भक्ति,
मस्तक विभूति, आँखें लाल,
रूद्र-रूप से डरता-काल।
जब मर्यादा, लांघे अभिमान,
जब रोए धरती, रोए इंसान,
तांडव जागे, बजे कराल,
कंपे सिंहासन, कांपे काल।
डमरू नाद में न्याय पुकार,
भस्म हो जाए पापाचार,
त्रिनेत्र खुलते ही-तत्क्षण काल,
मरते दैत्य-असुर, झुकते सब भाल।
रूद्र में शिव और शिव में शांत,
विष में अमृत और में अंध में कांत,
जो रूद्र समझे, जाने शिव का मर्म,
वही पाए मोक्ष, जाने क्या है धर्म।
रूद्र न क्रोध, धर्म का बल,
संहार नहीं—नव सृजन-फल,
जहाँ अटक जाए समय की चाल,
वहीं खड़े हों रूद्र महाकाल।
जब फँस जाओ - याद करो तुम,
कान में हल फिर बोले बाबा।
तब मैं कहता-भोले बाबा,
भोले बाबा, भोले बाबा।
भूत-भविष्य -बहुत भयंकर,
तब मैं याद करूँ शिव शंकर,
डर के साए छँटने लगते,
मन के बंधन कटने लगते।
कंकर-कंकर में है शंकर,
युद्ध के बंकर में है शंकर,
बिल्ली की म्याऊँ में शंकर,
मैं तो हर पल गाऊँ शंकर।
सन्नाटे की साँस में शंकर,
शोर भरे हर श्वास में शंकर,
न रोने की सिसकी में शंकर,
न रम की बोतल व्हिस्की में शंकर।
ज़ब राख हो जाए-हर अभिमान,
तब चरणों में-टिक जाए प्राण।
तब न नाम रहे, न रूप रहे,
याद शंकर का स्वरूप रहे।
जिस पल टूटे -सांसों का धागा,
होंठों पर हो—भोले बाबा,
मेरे शंकर बाबा,
भोले बाबा, भोले बाबा, भोले बाबा।
मैं कहता शिव और स्वयंभू,
हर-हर शम्भू, हर-हर शम्भू,
जो भी उसका नाम है ध्याता,
सो जीते जी मोक्ष को पाता।
न कोई आकार, न रंग-रेखा,
न जन्म-मरण का कोई लेखा,
न दीप-नैवैध, न पूजा-पाठा,
वो तो चेतन -मौन प्रभाता।
न वो मंदिर, न ही मस्जिद,
न ही काशी उसकी सरहद,
जहाँ विचार थक कर -रुक जाएँ,
वहीं पर शिव सामने आएँ।
अंबर में और बादल में शिव,
श्याने में और पागल में शिव,
लय में और ताल में है शिव,
बाल में, बाल की खाल में है शिव।
वो ही रुद्र, वो भोलेनाथ,
वो त्रिनेत्रधारी, गौरी के साथ,
जब “मैं” गलकर “तू” हो जाए,
तभी शिव का सत्य- बतलाए।
शिव ही सत्य, सुन्दर भी शिव,
काशी-काबा, मंदिर भी शिव,
ब्रह्मा है शिव, विष्णु भी शिव,
क्रांति है शिव, सहिष्णु भी शिव।
शिव बुद्ध में, दिगम्बर है शिव,
धरती और समंदर है शिव,
बाहर भी शिव, अंदर है शिव,
मन-मौजी मस्त -कलंदर है शिव।
मंगल में शिव, शिव में मंगल,
जंगल में शिव, शिव में जंगल,
गंगा में शिव, शिव में गंगा,
जपो नमः शिवाय-हो मन चंगा।
भस्म में शिव, शिव में-भस्म समाई
शिव में हर एक- रस्म समाई,,
मैं तो करता शिव की कमाई,
तुम भी करलो मेरे भाई।
शिव धूप में भी, छाँव है शिव,
जल में भी, और नावं है शिव,
नींद में सपना, सपने में शिव,
पराये और हर अपने में शिव।
डमरू में शिव, शिव में नाद,
मौन में शिव, शिव संवाद,
शून्य में शिव, शिव आकार,
अंत में शिव, शिव विस्तार।
शिव राह भी है, राहगीर भी शिव है,
हर एक निर्भय-वीर भी शिव है,
मंज़िल का पत्थर भी शिव है,
मेरा तो अब घर भी शिव है
साँप में और रस्सी में शिव है,
दूध दही लस्सी में शिव है,
खाने और पीने में शिव है
और जीवन जीने में शिव है।
जीवन में लय - लय में शिव है,
जीवन की हर शय में शिव है,
"नेता बोले वोट में शिव है,
वोटर के लिए नोट में शिव है" ।
नागा बाबा—अघोरी में शिव है,
टिंडा, लौकी—तौरी में शिव है,
चीनी और नमक में शिव है,
आलू की बोरी में शिव है।
दलिये, खिचड़ी- भात में शिव है,
मेरी तो हर बात में शिव है,
ज्ञान-विज्ञान में शिव समाया,
प्रैक्टिकल-थ्योरी में शिव है।
चूल्हे की आग में शिव है,
रोटी की फुलौरी में शिव है,
हाट-बाज़ार, ठेले-पटरी में शिव,
माता की लोरी में शिव है।
राजा बोले—तख़्त में शिव है,
फकीर कहे—कंठी में शिव है,
ढोलक बोले, हँसे मंजीरा,
नंदी में- गौरी में शिव है।
जाकर ढूँढा,
जगन्नाथ, पूरी में,
आँख खुली तो मैंने जाना,
हलवे और पूरी में शिव है।
देखे जो हँसकर, पाए वही,
ढूँढे जो रोकर, दूर ही शिव है,
हर-हर बोले जो हँस करके,
उसकी हँसखोरी में शिव है।
सच्ची रिश्तेदारी में शिव है,
अपनी पत्नी प्यारी में शिव है,
नहीं पराई नारी में शिव है,
न ही अत्याचारी में शिव है।
बात जो समझो, सार में शिव है,
माँ - बापू के प्यार में शिव है,
नहीं तानों की तलवार में शिव है,
न रुखे व्यवहार में शिव है।
साँप में और रस्सी में शिव है,
दूध, दही और लस्सी में शिव है,
खाने में भी, पीने में शिव है,
और जीवन को जीने में शिव है।
जीवन में लय — उस लय में शिव है,
हर एक “शय” की शय में शिव है,
न पापी -आततायी में शिव है,
तेरी चाची–ताई में शिव है।
भूखे की थाली में शिव है,
प्यासे की प्याली में शिव है,
नहीं डिग्री जाली में शिव है,
न बुरे शब्द-गाली में शिव है।
मेहनत की रोटी सादी में शिव है,
संतोष की नींद आधी में शिव है,
नहीं बुरी सोच वाले में शिव है,
न ही पाप कमाई गाढ़ी में शिव है।
हर एक जिम्मेदारी में शिव है,
हर गृहस्थ नर-नारी में शिव है,
जो भागा जिम्मेदारी से,
क्या उस भगवाधारी में शिव है ???
न झूठ की हिस्सेदारी में शिव है।
न स्वार्थ की होशियारी में शिव है,
जहाँ हक़ छीन कर बजें तालियाँ,
न उस झूठी गद्दारी में शिव है।
जहाँ भूखा देख कर मुँह मोड़ लें,
टूटे हुए को और तोड़ लें,
जहाँ करुणा बोझ लगे दिल को,
न उस दुनियादारी में शिव है।
जहाँ रिश्ते लाभ से जोड़े जाएँ,
स्वार्थो से हित मरोड़े जाएँ,
जहाँ भक्ति भी डर फैलाने को,
न उस पूजा विधि तैयारी में शिव है।
घर के आँगन, तुलसी थारी में शिव है,
बच्चे की किलकारी में शिव है,
माँ की डाँट, पिता की छाया,
हर रिश्ते की जिम्मेदारी में शिव है।
पसीने की बूँद, किसान की मेहनत,
हल की धार, क्यारी में शिव है,
सड़क किनारे बैठा साधु,
उसकी कुत्ते से यारी में शिव है।
फाइलों में दबा हो सच अगर,
तब न्याय की तैयारी में शिव है,
कोर्ट-कचहरी, कलम-काग़ज़,
क्या कानून की लाचारी में शिव है ???
हार के बाद जो हिम्मत जगे,
फिर उठने की तैयारी में शिव है,
टूटे सपने, सिले इरादे,
फिर से शुरू करने की बारी में शिव है।
जो कह दे—सब तेरा ही है,
उसकी दातारी में शिव है,
न माँगे, न तौले, बस बाँटे,
ऐसी हर यारी में शिव है।
सन में शिव है, मून में शिव है,
मेरी तो हर बोन में शिव है।
स्टेटस की भूख, फेम में नहीं,
साइलेंस वाले जोन में शिव है।
रील-लाइक्स, ट्रेंड में नहीं
रियलिटी की वॉइस में शिव है।
शोर भरे क्राउड में नहीं,
इंटरनल की नॉइस में शिव है।
डील और प्रॉफिट गेम में नहीं,
शो-ऑफ, झूठी फेम में नहीं,
गुनगुनाने के गुन में शिव है,
हार्ट की सच्ची धुन में शिव है।
चेयर के रेवोल्यूशन में नहीं,
नेता के एवोल्यूशन में नहीं,
यूनिवर्स के एवोल्यूशन में शिव है,
अर्थ के रेवोल्यूशन में शिव है।
पोस्ट की पोज़िशन में नहीं,
खोखली डेफिनिशन में नहीं,
कॉनशसनेस (चेतना ) की डायमेंशन में शिव है,
जीवन की ट्रांसफॉर्मेशन में शिव है।
डाटा की इंफ्लेशन में नहीं,
फेक की इंफॉर्मेशन में नहीं,
साइलेंस की वाइब्रेशन में शिव है,
अंतर की कैलिब्रेशन में शिव है।
लाइक्स की कंपटीशन में नहीं,
वायरल की ऑब्सेशन में नहीं,
सेल्फ की रियलाइजेशन में शिव है,
अहं की एलिमिनेशन में शिव है।
टाइम की रेस के-टेंशन में नहीं,
कल-परसों की -मेंशन में नहीं,
नाउ की प्रेज़ेंस में शिव है,
श्वास की एसेंस में शिव है।
शोर में भी शिव, मौन में भी शिव,
भीड़ में भी शिव, नीड में भी शिव,
नाम में शिव, धाम में शिव,
हर पहचान की पहचान में शिव।
नफ़रत में नहीं बसता है शिव,
आडंबर पे हँसता है शिव,
प्रेम की सच्ची बस्ती में शिव,
करुणा की हर कश्ती में शिव।
डर से नहीं चलता है शिव,
दिखावे में नहीं पलता है शिव,
साहस की शांत मस्ती में शिव,
सत्य की फेर-हस्ती में शिव।
शोर से नहीं गढ़ता है शिव,
झूठ से नहीं बढ़ता है शिव,
मौन की गहरी सृष्टि में शिव,
श्वास की सहज दृष्टि में शिव।
वो शान्ति है, क्रोध भी है शिव,
वो प्रश्न नहीं है, बोध ही है शिव,
जो भीतर की आँख जगाता,
वो निर्गुण ही शिव कहलाता।
मैं कहूँ कैसे, शब्द कहाँ हैं,
वो यहाँ-वहाँ है, सब जगहाँ है,
जो अंतर में दिखता शिव है,
क्या मूर्तियों में बिकता शिव है ???
मंदिर ढूँढे, मस्जिद सजाए,
नफ़रत में झंडे लहराए,
शिव न भाषण, न दंगाई में,
शिव तो मौन की सच्चाई में।
रटता गीता, दिल में द्वेष है,
हाथ में कुरान, ज़ुबाँ पे क्लेश है,
मंदिर ढूँढे पत्थर–माटी में,
पर शिव न मिले तेरी घाटी में।
न हिन्दू में, न मुसलमान में,
न नाम, झंडे या पहचान में,
न भगवा में, न हरी चादर में,
शिव बसता - मानवता के आदर में।
बंधन नहीं - मुक्त है शिव,
क्या मोह माया में लिप्त है शिव ???
हर कोई पूछता, शिव कहाँ है ???
जहाँ मैं मिटूँ, तू भी न रहे-
शिव वहाँ है… मेरा शिव वहाँ है।
अनिल आर्य...
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