आँखें मसलती चाय आई ,
बोली— मैं हूँ सुकून की रानी।
दो घूँट में सब जग जाएँ,
ऐसी मेरी कहानी।
दारू आई हँसती-डोलती,
कह गई दो खरी-खोटी,
बातें सच की ऐसी मारी,
ख़ामोशी भी हो गई छोटी।
छाती में मार के मुक्का,
मूंछ मरोड़ के बोला हुक्का,
मर्द बनो, मारो दो घूँट,
तुम्हे ऐटिटूड करता ये सूट,
चाय-दारू हुई खामोश,
हुक्के ने ली महफिल लूट...
फिर क्या था…
कड़वी दारू ख़फ़ा हो गई,
"मीठा" सच बोलकर सो गई,
हुक्का फिलॉसफी में खो गया,
थोड़ा चुप हो गया...
और चाय…
चाय को किसी ने पूछा ही नहीं,
ठंडी होकर बिस्कुट से लड़ गई,
नम्बर वन आने की जिद पे अड़ गईं।
सिसकी लेकर कप से बोली,
जो होनी थी वो होली,
पतीले से कहा,
ये अपमान मुझे नहीं स्वीकार,
चढ़ी टांड पर,
और मुँह छिपाकर,
सो-ली।
हुई सुबह,
सबने ढूँढा, चाय नहीं मिली,
मची चीख-पुकार,
सब-जन बिगड़ गए,
चाय पीने की,
जिद पे अड़ गए।
चाय अंदर से खुश,
पर तैश में आकर,
ऊपर से ही बोली,
हुक्का पी-लो,
मारो ना पेग।
हर कोई गलती माने,
कहे
बिना चाय बिस्तर न छोडूं,
अपना प्रण कभी न तोड़ूँ।
हुक्का हारा - दारू हारी,
अंततः चाय ने बाजी मारी।
नोट: एक चुस्की चाय,
केवल एक चुस्की चाय,
तन में जोश और
रिश्तों में गर्माहट लाए।
अनिल आर्य...
No comments:
Post a Comment