Thursday, 29 January 2026

सादगी हो तो ऐसी...

दहेज़ नहीं...

दूल्हा भी कमाता है,
दुल्हन भी कमाती है,
दोनों कहते हैं—
“अब पिता का सहारा हम बनेंगे।”
ज़रूर बनेंगे…
बस पहले शॉपिंग पूरी हो जाए।

दूल्हा बोला— “सादगी से करेंगे विवाह”
फिर निकली सूची—
पाँच शेरवानी,
सात जूते,
तीन घड़ियाँ—
एक बारात के लिए,
बाक़ी रील के लिए।

हाँ DJ थोड़ा hi-fi चाहिए,
लाइट ज़रा-सी dim चाहिए,
Loud म्यूज़िक हो,
शादी नहीं—फिल्म चाहिए।

रथ हो युद्ध वाला,
घोड़ा सफ़ेद शुद्ध वाला,
तलवार हो शिवाजी की,
घोड़ा चले स्लो-मोशन में,
ड्रोन ऊपर से वार करे,
सात फेरे नहीं—
रील के लिए
सात एंगल तैयार करे।

दुल्हन बोली— “मेकअप तो नैचुरल रहेगा”
फिर आया आर्टिस्ट—
चेहरा नहीं,
पूरी पेंटिंग बनाई,
माँ पहचान न पाईं,
पड़ोसन ने पूछा—
“बेटी विदेश से आई क्या?”

हल्दी—थी पीली,
पर खर्च—हरा डॉलर वाला।
मेहँदी—हाथ में कम,
इंस्टाग्राम पर ज़्यादा चढ़ी।

फूल असली नहीं—
पर बिल बिल्कुल असली।
डेकोरेशन ऐसी—
कि मंडप नहीं,
म्यूज़ियम लगे।

दूल्हा-दुल्हन बोले—
“पैसा मायने नहीं रखता”
और पिता जी ने
चुपचाप ज़मीन के काग़ज़
अलमारी से बाहर रख दिए,
और रिटायर्मेंट का सोचना बंद कर दिया।

दुल्हन ने साफ कहा—
“दहेज़ नहीं लूँगी।”
सबने राहत की साँस ली।
फिर जब शादी की लिस्ट आई—
तो लगा,
दहेज़ ने बस
कपड़े बदल लिए हैं।

फर्नीचर मत भेजना,
बस टीवी बड़ा दे देना,
दहेज़ का नाम मत लेना—
बस कपड़ों में कमी न हो,
और गहनों में
कंजूसी न झलके।

सोने का रेट ऐसा—
कि ज्वेलर नहीं,
कार्डियोलॉजिस्ट चाहिए,
एक हार देखा—
पिता जी की धड़कन
डाउन पेमेंट माँगने लगी,
लड़की वाले पिता की
रिटायरमेंट दो साल पीछे।

उधर लड़के वाले पिता—
कहते हैं, “हमें कुछ नहीं चाहिए,”
और भीतर ही भीतर
पेंशन से
शगुन की गणना करते हैं।

रिश्तेदार दोनों तरफ—
सम्मान के नाम पर खर्च,
प्रतिष्ठा के नाम पर तुलना।
ना लेने का वादा,
ना कम करने की हिम्मत।

बेटी कहती है—
“मैं आत्मनिर्भर हूँ।”
बेटा कहता है—
“मैं सब संभाल लूँगा।”

और तब-
जब नव-दंपति कहते हैं,
“अब सब हम संभाल लेंगे,”
दोनों पिता
एक-दूसरे को देख
बस मुस्करा देते हैं।

ना ताना,
ना शिकायत—
बस अनुभव की हँसी।

क्योंकि वे जानते हैं—
इस शादी में
दहेज़ नहीं गया है,
गए हैं बस
रिटायरमेंट के कुछ साल।

अनिल आर्य...

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