सूर्य दिशा बदलता है,
और जीवन की चाल बदल जाती है।
जो थमे थे ठंड की जड़ता में,
उनमें फिर से आग जल जाती है।
अंधकार से कह दो-हट जाए,
अब उत्तरायण का द्वार खुला।
मेहनत के दाने पकते हैं,
किसान का स्वप्न साकार फला।
तिल-गुड़ सा बनो जीवन में,
कटुता छोड़ो, मधुर बनो।
जो बीत गया, सो सीख बना,
नए संकल्प से आगे बढ़ो।
आज सूर्य नहीं,
हमारी सोच को ऊपर उठना है।
मकर संक्रांति कहती है—
अब गिरना नहीं, केवल चढ़ना है।
अनिल आर्य...
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