ऋतम्भरा निमित्त चेतना से निर्मिता,
अंतरिक्ष-रज कण-कण संचित-संहिता।
प्रकृति-प्राण की दिव्य अभिव्यक्ति-अभिव्यक्ता,
सृष्टि-सार की मूर्त परिणति- परिणीता।
ललाट-दीप्ति ज्यों उषा-प्राची,
वाणी सरस्वती-सी सव्या साची।
मृदुल-मेखला मर्यादा-आवृत
सौम्य-सुषमा शील-सुसज्जित।
नयनों में नव-नीलाकाश
हृदय-दीप में वेद-विलास।
स्नेह-सिक्त संवेदना धारा
जीवन-वन की हरित क्यारा।
विश्वसनीयता ज्वलंत ज्वाला
धैर्य-धरा की दृढ़ रखवाला।
सह-अस्तित्व का सत्य संवेग
शांत-ज्वार, दमित उद्वेग।
यज्ञाग्नि-सा तप का विस्तार
ममता-सिन्धु अपरम्पार।
संघर्षों में वज्र-प्रहार
सौम्यता में चन्द्र-प्रसार।
प्रजनन-पोषण सृष्टि-विधान
जीवन-बीज का प्रथम विधान।
पाषाण-खण्ड सम अचल आधार
युग-निर्माण का मौन विस्तार।
अन्तर्मन आलोकित ज्वाला
तम-रजनी को करती काला।
दुर्गा-शक्ति, करुणा-धारा
जग-वंदिता मातृ-उजियारा।
मृत्यु-द्वार से करती पार
नव-जीवन का देती उपहार।
पतिव्रता-तप तेज अपार
धारण करती जग-आधार।
उज्ज्वल, प्रदीप्त, दिव्य विहारी
श्रद्धा-वेद की ज्योति पुजारी।
आर्य-संस्कृति की आधार-धारी
यही तो है आर्यव्रत की नारी।
मातृशक्ति को सप्रेम समर्पित,
अनिल आर्य...
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