फाग — रिश्तों की मिठास
फागुन जब देहरी पर आता है,
सिर्फ़ रंग से ही नहीं,
वो रिश्तों की सूखी डोर को
पानी के प्रेम से तर कर जाता है।
हल्की सी गुलाल की छुअन,
बरसों की दूरी पिघला देती है,
एक मुस्कान और अनकही बातें,
मन की गाँठ सुलझा देती है।
जो मन में रूठा बैठा था,
रंग उसे बना दें रंगीला,
सूनी पड़ी जिंदगानी,
फाग बना देती सजीला।
न कोई ऊँच-नीच का पर्दा,
न अहंकार की दीवार रहे,
बस अपनापन ऐसे घुले
पिचकारी से प्यार बहे ।
भाई की हँसी में स्नेह घुले,
बहन के गालों पर सजे गुलाल,
शिवा सादगी में हल्दी से सजे,
भाभी -देवर दोनों हों लाल।
बड़ों के चरणों में आदर ग़ुलाल,
छोटों के संग खिलखिलाहट की बात,
रिश्तों की थाली में आज
प्रेम ही सबसे बड़ी सौगात।
फाग यही तो कहता है,
मन की उदासी को तोड़ो,
थोड़ा सा रंग लगाओ
और थोड़ा सा मन को भी जोड़ो।
ऐसा फाग रचे इस बार,
हर घर मधुमय हो जाए,
रंग उतर जाएँ चेहरे से,
पर मिठास सदा के लिए रह जाए।
अनिल आर्य...
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