वसन्त आया,
जर्जर देह में
फिर जागा स्पन्दन।
सूनी डालों पर
फूटे अंकुर,
मौन धरा में
जागा जीवन।
यह तिथि नहीं,
समय का आवाहन है,
जागो!
भीतर सुप्त अग्नि को
फिर प्रज्वलित करो।
जब भगवान ब्रह्मा ने
प्रथम रश्मि से
रचा विस्तार,
तब से हर वर्ष
एक ही पुकार,
ह्रदय से नव हो जाओ!
नवरात्रि का व्रत,
अंतर में उतरता,
शक्ति बनता,
अहं को गलाता।
जग हँसता है
क्षणिक उन्माद में;
पर मनुष्य!
तू ठहर,
स्वयं के साध,
तम से बाहर आ।
नवसंवत्सर
दीप नहीं केवल,
अग्नि है,
जला दे जड़ता,
गढ़ दे चेतन।
त्याग कर क्लेश,
संशय, मोह,
उठ,
और चल
प्रकाश-पथ पर।
नव हो विचार,
नव हो व्यवहार,
नव हो संकल्प,
यही सच्चा उत्सव।
चल,
स्वयं से आगे,
स्वयं में उतर,
कर,
यहीं से नव आरम्भ।
तभी
और केवल तभी
हमारा नववर्ष
सजेगा,
जब अंतर का
तम मिटेगा,
हर-उर प्रकाश जगेगा।
अनिल आर्य...
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