Friday, 6 March 2026

प्रेम

प्रेम

प्रेम न केवल कोमल पंखुड़ी,
न क्षणिक संदेशों की भाषा;
यह जीवन की गहरी सरगम,
आत्माओं की मौन अभिलाषा।

दिन की चंचल भाग-दौड़ में भी
जब स्मृति सहसा मुस्काए,
मन के अंतरतम आँगन में
एक शीतल दीप जल जाए।

पिता का दृढ़, अडिग विश्वास
पथ को साहस से भर देता,
माता की ममता का आँचल
हर संताप हर लेता।

बहन की हँसी की उजली रेखा
आँगन में मधुमास घोल दे,
भाई का स्नेहिल संबल
जीवन को दृढ़ आधार दे।

और जब संध्या धीरे उतरे,
दिन की थकन नयनों में आए,
प्रिय की एक मृदुल दृष्टि
जीवन को फिर गीत बनाए।

बच्चों की किलकारी में
भविष्य का स्वर्णिम आकाश,
तब मन जान सके सहसा
प्रेम स्वयं एक मधुर निवास।

जहाँ संबंधों की वीणा पर
स्नेह के सुर झंकृत होते,
साधारण दिन उत्सव बनते,
और लय कभी न ख़ोते।

अनिल आर्य...

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