घर की छत दिखती है,
दीवारें भी नज़र आती हैं,
खिड़कियों से आती धूप
आँगन को रोशन करती है।
पर एक चीज़ ऐसी भी होती है
जो दिखाई नहीं देती
पर उसी पर
पूरा घर टिका होता है।
वह है नींव।
पिता भी कुछ ऐसे ही होते हैं।
वे छत की तरह
आँचल फैलाकर नहीं ढकते,
न फूलों की तरह
खुशबू बनकर महकते हैं।
वे तो बस
नींव की तरह
चुपचाप नीचे खड़े रहते हैं।
उनकी हथेलियों की कठोरता में
दिन भर की धूप होती है,
और आँखों की थकान में
परिवार के सपनों की रखवाली।
उन्होंने कभी नहीं कहा
“मैंने तुम्हारे लिए इतना किया।”
बस चुपचाप
अपनी इच्छाएँ मोड़ कर रख दीं।
जब तुम छोटे थे,
तो तुम्हें ऊँचा उठाने के लिए
उन्होंने खुद
थोड़ा और झुकना सीख लिया।
जब तुम बड़े हुए,
तो तुम्हें आगे बढ़ते देखने के लिए
उन्होंने खुद
थोड़ा पीछे रहना स्वीकार लिया।
तुम्हें शायद याद न हो,
पर कई रातें ऐसी थीं
जब घर सो चुका था
और पिता जाग रहे थे।
कभी हिसाब करते हुए,
कभी भविष्य सोचते हुए,
कभी बस
तुम्हारी चिंता करते हुए।
पिता का प्रेम
नदी की तरह शोर नहीं करता,
वह धरती की तरह
सब कुछ सहता है।
वह प्रेम
न माँगा जाता है,
न दिखाया जाता है,
बस निभाया जाता है।
और सच तो यह है,
जब तक पिता साथ होते हैं,
हम समझ ही नहीं पाते
कि हम कितने सुरक्षित हैं।
क्योंकि
जिस प्रेम ने हमें थाम रखा है
वह दिखता नहीं।
वह तो बस
घर की अदृश्य नींव की तरह
चुपचाप कहता है,
“तुम बस खड़े रहो ऊँचे होकर…
मैं नीचे से
तुम्हें गिरने नहीं दूँगा।”
अनिल आर्य...
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