मन चाहे नभ के तारे,
दूर क्षितिज का मान;
चाहत अपनी राह बनाती,
रचती नित अभियान।
पर जीवन की रीति निराली,
सब कुछ कहाँ सुहाता;
जो माँगा वह दूर खड़ा,
कुछ और हाथ आ जाता।
क्षण भर मन खिन्न भी होता,
स्वप्नों का टूटे गान;
फिर अंतर से स्वर उठता
यह भी होगा कल्याण।
जो नहीं मिला वह इच्छा थी,
जो मिला वही प्रभु-दान;
प्रभु की गूढ़ व्यवस्था में
छिपा हुआ हित-ज्ञान।
संतोष जहाँ दीपक बनता,
मन पाता विश्राम;
हर प्राप्ति तब लगती जैसे
ईश्वर का शुभ नाम।
धीरे-धीरे ज्ञात यही
जीवन का पावन मान:
जो चाहा वह आवश्यक नहीं,
जो मिला वही कल्याण।
और यही सरल स्वीकार
देता गहन निदान
प्रभु जो देता प्रेम से,
वही होता है वरदान।
वरदान क्या वह जो मन को भाए,
या जो हित में सिद्ध हो जाए?
क्षण का सुख अक्सर छल करता,
दूर का कल्याण ही सच बतलाए।
इसलिए जो प्रभु दे निस्संग भाव से,
उसे ही मानो सच्चा दान,
अच्छा लगे हितकर भी होगा?
जो हमें श्रेष्ठ हो - दो प्रभु वही वरदान।
अनिल आर्य...
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