Tuesday, 10 March 2026

बंधन

बंधन का उलटा अर्थ

पुरुष बड़ा स्वतंत्र कहा जाता है
बस इतना कि नौकरी छोड़ने का विचार भी
रोटी से अनुमति लेकर ही आता है।
दिन भर दुनिया की धूप में झुलसकर
जब वह घर की ओर लौटता है,
मन बस यही चाहता है
थोड़ी छाँव, दो घड़ी शांति।
उसे लगता है
घर ही उसका विश्राम है,
और बाहर की दुनिया
एक लंबा अनिवार्य बंधन।
पर उधर
वही घर किसी और के लिए
दीवारों का घेरा है।
औरत बरसों से
उसी चौखट के भीतर
दिनों को सिलती रहती है,
और सोचती है
कभी तो बाहर का आकाश देखूँ।
जब नौकरी का दरवाज़ा खुलता है,
उसे लगता है
मानो स्वतंत्रता की हवा मिल गई।
पर अनजाने ही
वह एक नया बंधन
मुस्कुराकर अपना लेती है,
जिसे वह
खुशी से आज़ादी का नाम दे देती है।
जिस रास्ते को पुरुष
अपनी मजबूरी मानता है,
उसी को स्त्री
स्वतंत्रता का द्वार समझती है।
और जिस घर में
पुरुष शरण ढूँढता है,
उसी घर को स्त्री
कभी-कभी बंधन मान बैठती है।
विडम्बना देखिए
दरवाज़ा एक ही है,
बस दिशाएँ बदल जाती हैं।
एक थककर भीतर आना चाहता है,
दूसरी उम्मीद लेकर बाहर जाना चाहती है।
शायद जीवन का सबसे गहरा व्यंग्य यही है
मनुष्य अक्सर
दूसरे के बंधन को ही
अपनी स्वतंत्रता समझ बैठता है।
और सच तो यह है
स्वतंत्र कोई नहीं,
बस हर किसी की जंजीर का
नाम अलग-अलग है।

अनिल आर्य...

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