प्रेम न उच्चरित शब्द है,
न ही चंचल आकर्षण;
यह तो निःशब्द उपासना है,
हृदय से रूह तक का स्पंदन।
नयनों से इसका उद्गम नहीं,
न अधरों पर इसका निवास;
यह तो अंतःकरण की सुगंध है,
जो बन जाती है मधुर अनुभास।
कभी स्मृतियों की स्निग्ध छाया बन
मन-आँगन में उतर आता है,
कभी मृदुल हास की किरण बन
अंतरतम को आलोकित कर जाता है।
जहाँ वाणी मौन हो जाए
और मौन ही संवाद बने,
जहाँ वेदना भी मधुर लगे
वही प्रेम का परम प्रमाण बने।
जिसे एक बार रूह स्पर्श कर ले
वह बंधन कभी क्षीण नहीं होता,
प्रेम जहाँ हृदय में प्रतिष्ठित हो
वहाँ जीवन कभी शून्य नहीं होता।
अनिल आर्य...
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