Friday, 20 March 2026

नवचेतना का नवरात्र

नवचेतना का नवरात्र

नहीं आडंबर, नहीं बाह्य आकर्षण,
सत्याग्नि में हो आत्मावलोकन।
अंतर की मलिनता आज पिघले,
विचार सुधरें, संस्कार निकले।
आत्म-शुद्धि का यह पावन काल,
मन बने निर्मल, बुद्धि निष्कलुष विशाल।
व्रत न केवल उपवास का नाम,
इंद्रिय-निग्रह ही उसका प्राण।
ऋतु परिवर्तन का सूक्ष्म संकेत,
संयम से साधो तन-मन का क्षेत्र।
सात्त्विक आहार, प्रकृति का वरदान,
शरीर हो शुद्ध, जागे दिव्य ज्ञान।
माँ नहीं मूर्ति, न सीमित आकार,
वह चेतना-शक्ति, व्यापक विस्तार।
उसको जागृत करना ही साधन,
यही है सच्चा देवी-आराधन।
जब चित्त निर्मल, संकल्प प्रखर,
तभी उठता है जीवन उत्तम स्वर।
इच्छाओं पर संयम का अनुशासन,
संकल्प बनें फिर दृढ़ हो वाचन।
व्रत से उपजे धैर्य अपार,
अंतर में जगे सत्य का सार।
नवरात्रि का यह वैदिक संदेश,
स्वयं को जानो, यही उपदेश।
वेद-विहित जीवन, यज्ञमय विचार,
इसी में निहित है उत्कर्ष अपार।
जब अंतर में जागे दिव्य ज्योति-प्रकाश,
तभी सार्थक होता है नवरात्रि का उल्लास।

अनिल आर्य...

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