फाल्गुन की पूर्णिमा जब
चन्द्र श्वेत शंख-सा नभ में बजता है,
तब आर्यभूमि की वाणी
फिर एक पुरातन गाथा कहती है।
जब अधर्म के मद में चूर
हिरण्यकश्यप ने सत्य को ललकारा था,
तब बाल-हृदय में दीप बनकर
प्रह्लाद अडिग खड़ा था।
वरदानों के आवरण में लिपटी
होलिका
जब अग्नि में प्रविष्ट हुई,
तो ज्वालाओं ने भी पहचान लिया
आर्य का सत्य न जलता है,
आर्य की श्रद्धा न झुकती है।
होलिका-दहन केवल लकड़ियों का दाह नहीं,
यह अनार्य वृत्तियों का परित्याग है;
यह भीतर के तम पर
धर्माग्नि का प्रज्वलित राग है।
और जब अग्नि की राख पर
नई प्रभा का स्पर्श उतरता है,
तब ब्रज में स्मृत होती है वह मधुर लीला
जहाँ कृष्ण की वंशी
फाग का वेद गाती थी,
और राधा की मुस्कान
अबीर-सी नभ में छा जाती थी।
वहाँ रंग उच्छृंखल नहीं थे,
वे संस्कारों के सुमन थे;
वहाँ हास्य उद्दंड नहीं था,
वह स्नेह की मर्यादा में बँधा स्पंदन था।
आर्यत्व का अर्थ है
सत्य पर अडिग रहना,
बल में विनय रखना,
उत्सव में संयम रखना,
और भिन्नता में भी आत्मीयता देखना।
होली हमें यही स्मरण कराती है
धर्म केवल ग्रंथों में नहीं,
वह आचरण में दीप्त होता है;
रंग केवल देह पर नहीं,
वे चरित्र पर भी चढ़ते हैं।
आओ, इस पावन अवसर पर
अधर्म, द्वेष और अहंकार को अग्नि में समर्पित करें,
और प्रेम, साहस, करुणा व शुचिता के रंगों से
अपने जीवन को आर्यमय करें।
आपका प्रत्येक विचार पावन हो,
प्रत्येक कर्म मर्यादित हो,
और प्रत्येक संबंध स्नेह से सिंचित हो।
आपको एवं आपके परिवार को आर्यत्व से आलोकित, मर्यादित और मंगलमयी होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।
अनिल आर्य...
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