बूढ़ा पिता और बंद कमरा
घर बड़ा था,
कमरे भी बहुत थे,
पर एक कमरा ऐसा था
जो हमेशा बंद रहता था।
उस कमरे में
एक बूढ़ा पिता रहते थे।
सुबह खिड़की से
थोड़ी धूप आती,
दीवारों पर चुपचाप
सरक जाती।
पिता उसी रोशनी में
पुरानी तस्वीरें देखते,
और कभी-कभी
धीरे से मुस्कुरा देते।
एक तस्वीर में
नन्हा सा बच्चा था
कंधों पर बैठा हुआ,
हँसता हुआ।
पिता उँगली फेरते हुए
कहते
“मेरा बेटा…”
फिर दरवाज़े की ओर देखते,
शायद कोई आएगा।
बाहर
घर में रौनक थी,
हँसी थी,
टीवी की आवाज़ थी,
मेहमानों की बातें थीं।
पर वह कमरा
अक्सर बंद ही रहता था।
कभी-कभी
बहू खाना रख जाती,
कहती—
“बाबूजी, खा लेना।”
पिता मुस्कुरा कर कहते
“हाँ बहू, रख दो।”
और फिर
थाली से ज़्यादा
दरवाज़े को देखते रहते।
एक दिन
उन्होंने धीरे से पूछा
“बहू, बेटा घर पर है क्या?”
बहू ने कहा
“हैं तो…
पर बहुत व्यस्त हैं।”
पिता ने सिर हिलाया,
जैसे जवाब पहले से जानते हों।
फिर खिड़की से बाहर देखते हुए बोले
“जब छोटा था ना…
तो मेरे कमरे से बाहर ही नहीं जाता था।
रात को भी
मेरी उँगली पकड़कर सोता था…”
बात यहीं रुक गई।
शाम ढली,
कमरे में अँधेरा उतर आया।
पिता ने
धीरे से दरवाज़े की ओर देखा
और फुसफुसाए
“कोई बात नहीं…
बच्चे बड़े हो जाते हैं।”
कुछ दिनों बाद
वह कमरा खुला।
लोग अंदर आए,
चादरें बदलीं,
सामान हटाया।
चारपाई खाली थी।
दीवार पर
वही पुरानी तस्वीर टंगी थी
जिसमें एक छोटा बच्चा
पिता के कंधों पर हँस रहा था।
और तस्वीर के नीचे
टेबल पर एक कागज़ रखा था।
उस पर बस इतना लिखा था
“कमरा बंद नहीं था बेटा…
बस दरवाज़ा
तुमने कभी खोला नहीं।”
अनिल आर्य...
No comments:
Post a Comment