Monday, 14 April 2014

ज़िद है....

खुद की  बनायी
हर सीमा के
पार जाने की ज़िद है,
खुद से जीत कर
खुद ही हार जाने की ज़िद है …

नाकाफ़ी हैं तेरी दोस्ती
मेरी हसरतों के लिए,
तुझे पूरा खोने की
या तो पूरा पाने की ज़िद है....

हर बार हारा
दोस्ती मैं जो सख्स,
प्यार मैं उसे
पार पाने  की ज़िद है....


आज आजमा लूँ तुम्हे भी
ऐ मेरे बदनसीब - नसीब ,
फ़लक तक जाकर, चाँद छुए बिन
लौट आने की ज़िद है....

तेरे खिलाफ़ लड़ना 
मुनासिब नहीं 'अनिल'
तुम्हे पाने की बजाय
भूल जाने की ज़िद है....


खुद की  बनायी
हर सीमा के
पार जाने की ज़िद है,
खुद से जीत कर
खुद ही हार जाने की ज़िद है….

                      This is future.... One day.... i will make it true... Anil Aarya.... अनिल आर्य 


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