Thursday, 17 April 2014

अमर - समर

मेरे विधाता 
क्यूँ 
विरुद्ध विधि के मेरी 
  मेरा समर है ?

सुन वज्र ह्रदयी 
न हारूँगा 
आयुर्बल मेरा 
अमर है… 

थका हूँ 
पर हारा नहीं हूँ,
बदक़िस्मत सही 
     बेचारा नहीं हूँ.… 

लगन का धनी हूँ 
हूँ पक्का अपनी जुबान का,
कभी तो कहीं मिलूंगा तुमसे
ये वादा रहा आज 
    जमीन से आसमान का....

मेरा अमर - समर 
मुझसे ही चलता है 
देखता हूँ 
कब तक मेरा विधाता 
   मुझको ही छलता है… 

अनिल अपार साहस
 जीत की परिभाषा है,
जीतूँगा एक दिन 
मुझको खुद से 
   आशा है....

     अनिल आर्य.... 




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