जो मेरी प्यास
बुझ गई होती ,
तो ये जिंदगी भी
कोई जिंदगी होती....
मैं मर जाऊँगा
इस प्यास से ,
प्यास ये कुछ ख़ास है
ख़ास ये एहसास है…
इसके बुझने में
मजा नहीं,
भड़कने में कोई
सजा नहीं ,
ये बुझ जाये
ऐसी मेरी रज़ा नही....
क्योंकि
जो मेरी प्यास
बुझ गई होती ,
तो ये जिंदगी भी
कोई जिंदगी होती....
प्यास की क़ीमत
आज प्यासा जानता है
कल कुंआ बतलाएगा ,
नहीं आया ग़र कोई प्यासा दर पे
तो कुंआ सड़ जाएगा....
हर कोई जानता है
कि इतिहास खुद को
दोहराता है,
कभी प्यासा कुंवे के पास
तो कभी कुंआ प्यासे के पास
जाता है....
वक़्त के हाथों
हर कोई मजबूर है,
कल कुंआ प्यासे से
दूर था
और आज प्यासा कुँवें से
दूर है....
प्यासे ने मस्ती मैं झूम कर
कुछ यूँ लिखा कि ,
जो मेरी प्यास
बुझ गई होती ,
तो ये जिंदगी भी
कोई जिंदगी होती....
ग़र बुझ जाती ये
तो फिर क्या मेरी बंदगी होती ?
बिन बंदगी
क्या मेरी जिंदगी होती……
न किसी का क़सूर ,
यही जिंदगी का दस्तूर
कुंआ सड़ गया ,
प्यासा मर गया
दोनों हारे,
जीता उनका गुरूर....
दोनों बेक़सूर
हार कर भी
विजय दम्भ मैं चूर
क्या सच मैं दोनों बेक़सूर ???
अनिल आर्य…

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