मेरी चाहतों का
अजब सिलसिला है
तेरी रुख़सतों में
मज़ा जो मिला है
अन्दाज 'अनिल' अब
संभाले न संभलें
उठने में नहीं
जो गिरने का मज़ा है
इश्क़ में आशिक़
मरे तो मरे फ़िर
जो जीता है उसको
कौन पूछता है ???
है जान हाज़िर
आज ही क़त्ल कर दो
ज़िंदा हूँ लेकिन
ज़िंदगी से ग़िला है
गौरमतलब मुहब्बत
है तेरी कहानी
जो जितना बुझा है
वो उतना जला है
मैंने बुझ के जाना
जलने में नहीं कुछ
सुलगने में है जो
वो असली मज़ा है....
अनिल आर्य…
अजब सिलसिला है
तेरी रुख़सतों में
मज़ा जो मिला है
अन्दाज 'अनिल' अब
संभाले न संभलें
उठने में नहीं
जो गिरने का मज़ा है
इश्क़ में आशिक़
मरे तो मरे फ़िर
जो जीता है उसको
कौन पूछता है ???
है जान हाज़िर
आज ही क़त्ल कर दो
ज़िंदा हूँ लेकिन
ज़िंदगी से ग़िला है
गौरमतलब मुहब्बत
है तेरी कहानी
जो जितना बुझा है
वो उतना जला है
मैंने बुझ के जाना
जलने में नहीं कुछ
सुलगने में है जो
वो असली मज़ा है....
अनिल आर्य…

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