विश्वास दिला कर
अक्सर
विश्वास
हिला देते हैं लोग
हर बार
इक नया
अपमान का घूँट
पिला देते हैं लोग....
कवच गया
कुण्डल गया
ये सब
कर्ण कि थाती है
अच्छा जी,
तिक्त शब्दरूप
विष भी पीना है
अभी महादेव भी बाकी है....
अरे
मधुरतम जीवन
के इस
प्राँगण में
यौवन के सुखतम से
क्षण में
अपने प्राणों
के इस
प्रण में
जीवन के छोटे से
रण में
मुझे घाव सी लेने दो
जीने का है
शौक मुझे भी
ज़रा
चैन से जी लेने दो....
अनिल आर्य....
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