दे दिया करो
दो मीठे बोल प्यार के
ग़र दे सको तुम,
ये सैद्धांतिक तल्ख़ भाषण
रहने ही दो कृपा हो,
उपदेश आजकल
खलते बहुत हैँ…
'आस्था' से आस्था
डगमगा सी गयी है ,
बस थोड़ा प्यार माँगा था
नहीं देना तो मत दो,
रूखा अन्दाज इतना
हुई कौन सी खता है ???
अनिल आर्य....
दो मीठे बोल प्यार के
ग़र दे सको तुम,
ये सैद्धांतिक तल्ख़ भाषण
रहने ही दो कृपा हो,
उपदेश आजकल
खलते बहुत हैँ…
'आस्था' से आस्था
डगमगा सी गयी है ,
बस थोड़ा प्यार माँगा था
नहीं देना तो मत दो,
रूखा अन्दाज इतना
हुई कौन सी खता है ???
अनिल आर्य....
No comments:
Post a Comment