ख़ामोश लबों पर है
बेजुबां हकीक़त
बेतरतीब सी बिखरी है
बेइन्तिहाँ मुहब्बत....
और
हक़कीत को खोल के
बताया नहीं जाता
ये इश्क़ ओ मुश्क़ है 'अनिल'
छुपाया नहीं जाता....
और
ये इश्क़ ही बंदगी
ये इश्क़ ही खुदा है
और अपनी खुदाई
इस जग से जुदा है....
हमारा
जीना भी लाज़मी है
और ये टुकड़ों कि जिंदगी है
खुदा जो ठुकरा दे बन्दे
तो कैसी ये तेरी बंदगी है....
अनिल आर्य…
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