Thursday, 17 April 2014

मुक़म्मल

मुक़म्मल होने की चाहत में
दिन-रात भुला बैठा
और मुक़म्मल हुआ
तो पाया
कि इस आधे-अधूरे जहां में
कोई मुक़म्मल नहीं होता....


जो दिखते हैं मुक़म्मल
है नक़ाब उनके चेहरे
उनकी हकीक़त जाकर
उनके आइनों से पूछो....
उनकी आँखों मैं झांककर देखो
रूह का चैन नहीं मिलता
कि इस आधे-अधूरे जहां में
कोई मुक़म्मल नहीं होता....


अनिल आर्य…

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