Tuesday, 29 April 2014

थोड़ी सी ग़ैरत / बची थी / लुटा दी

नींद नहीं आती
तेरी बेरुखी से
तड़पने को छोड़ा
बस मारा नहीं है

जीने की चाहत
मेरी बहुत है
बस जीने के लायक
जहां चाहिये है

ज़माने ने समझा नहीं
इसलिए किया सब
तुम जानती थी
फिर भला क्यों ऐसा ???

थोड़ी सी ग़ैरत
बची थी
लुटा दी ,
क्या अब ऐसा
जिस पर
फक्र हो ???

रब के कुफ्र से
शिकायत भला क्यों ???
तुम तो थी अपनी
तुम्हारा कुफ्र झेला....

शिकायत नहीं तुमसे
नहीं कोई गिला है
जिसकी जो किस्मत
उसको मिला है…

बस थोड़ी हिम्मत कर के
और थोड़ी हद कर दो
मेरी हद खत्म फ़िर
फिर
मेरा सिलसिला है…

अनिल आर्य …

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