Tuesday, 29 April 2014

तांडव का लास्य

दो कांच के टुकड़े
हैं छुपाते
मेरी लाल सुर्ख आँखें
सच तो ये है
की आँखों में ये सुर्खी
सुर्खी नहीं
उबलता लहू है
कहीं बह न निकले
जला दे जमाना
ये अजस्त्र लावा - ज्वाल
क्यों जमता नहीं है ???
है तोड़ा - मरोड़ा
झँझोड़ा भी खुद को
ये तांडव का लास्य
बदलता नहीं  है …


अनिल आर्य… 

No comments:

Post a Comment