Saturday, 7 February 2026

हक़

मैं शरीफ़ हुआ तो क्या…?
वो अपना हक़ छोड़ दे…?
मेरी पत्नी को मुझ पर शक भी है,
और शक करना एक औरत का हक़ भी है।

कमी थोड़ी रही होगी कोई मेरी,
पर याद नहीं क्या…?
और थोड़ा शक किया तो,
गलती उसकी क्या…?

हाँ, दोबारा गलती,
नहीं तुम्हारे साथ करेंगे,
आज के बाद किसी और-
औरत से नहीं बात करेंगे।

क्योंकि शक़ से घर में CCTV आँखें लग जाती हैं,
जो चुप्पी भी रिकॉर्ड कर लेती हैं,
मोबाइल की स्क्रीन नहीं,
नज़रें पहले चेक कर लेती हैं।

हँसी ज़्यादा आई तो सवाल तैयार,
“किसकी याद में इतना प्यार?”
चुप रहे तो इल्ज़ाम पक्का,
“देखो… मन में कुछ है यार!”

देर से आए तो कहानी चाहिए,
जल्दी आए तो शक का दायरा,
सच बोलो तो ड्रामा बनता है,
झूठ बोलो तो सीधा ट्रायल एरिया।

मैं कहूँगा —थक गया हूँ आज ज़रा,
वो बोले—“थकान किससे?”
मैं कहूँगा -“काम बहुत था ऑफिस में,”
वो बोले-“नाम बताओ… किससे?”

हक़ उसका है—पूछे हर बात,
हक़ उसका है—तौले हर साँस,
पति हूँ, कोई फाइल नहीं,
फिर भी रोज़ होगी, जाँच-पड़ताल खास।

पर मानता हूँ—ये व्यंग्य भी अधूरा है,
क्योंकि सच थोड़ा और गहरा है,
जिस औरत को इतना शक है मुझ पर,
वो शायद मुझसे … बेहिसाब जुड़ी है।

सच कहूँ तो मैं लड़ सकता हूँ दुनिया से,
पर तुमसे नहीं—कभी नहीं,
क्योंकि मेरी हर जीत का मतलब,
तुम्हारी मुस्कान से है, किसी और से नहीं।

तुम मेरा गुस्सा भी सह लेती हो,
मेरी ख़ामोशी भी ओढ़ लेती हो,
मैं टूटूँ तो बिना कहे,
मेरे टुकड़े चुन लेती हो।

अगर कह दूँ आज सब छोड़ दूँ,
ये भीड़, ये शोहरत, ये नाम,
हर किसी फीमेल से काम,
तो यक़ीन मानो—एक पल में,
तुम्हारे कदमों में रख दूँ हर शाम।

क्योंकि पत्नी सिर्फ़ शक नहीं होती,
वो आदत, ज़रूरत, साँस होती है,
दुनिया छोड़ने की बात मज़ाक नहीं,
जिस दिन वो रूठे—सारी दुनिया ख़ामोश होती है।

अनिल आर्य...

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