पिता...
वह
जो थक कर घर आता है,
और पूछता है—
सब ठीक है न?
कभी नहीं बताता
कि उसके भीतर
क्या-क्या टूटा है।
वह
जो अपने सपनों को
चुपचाप
मेरे नाम लिख देता है,
और फिर
उन्हें याद तक नहीं करता-
ताकि मैं
कभी बोझिल न हो जाऊँ।
पिता धूप नहीं,
धूप में खड़ा
एक साया है—
जो खुद जलता है,
पर बच्चों तक
आँच नहीं पहुँचने देता।
मैं जब रोया,
वह रोया नहीं,
मैं जब हारा,
वह टूटा नहीं।
उसने अपने आँसू
मेरी नींव में
गाड़ दिए—
ताकि मेरी इमारत
कभी डगमगाए नहीं।
उनके हाथ
कठोर थे,
पर उन्हीं हाथों में
मेरी नींद
सबसे सुरक्षित रही।
उन्होंने मुझे
गोद में कम उठाया,
ज़िम्मेदारियों में ज़्यादा सिखाया,
शायद इसलिए
मैं गिरा कम,
समझदार जल्दी हो गया।
आज जब मैं
खुद पिता हूँ,
तब समझ आता है—
वह क्यों
हर बात पर
खामोश रहते थे।
कुछ प्रेम
कहे नहीं जाते,
सिर्फ जिए जाते हैं।
और पिता
वही प्रेम है—
जो कभी पूरा समझ नहीं आता,
पिता वह बरगद है,
जो प्राण-वायु भी देता है,
छाँव भी,
और अपना पानी
और भोग्य भी स्वयं ही
लेता है,
पाताल की किसी गहराई से।
अगर ऊपर वाले से
कुछ माँग सकूँ,
तो बस इतना—
मेरे पिता को
अब वो आराम दे देना
जो उसने
न कभी चाहा
और न ही कभी माँगा…
अनिल आर्य...
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