शिव:रात्रि, नहीं जागरण
यह रात्रि नहीं, है जागरण,
चेतना का गहन विस्तार है।
जहाँ दृश्य और अदृश्य के बीच
भेद का अंतिम द्वार है।
न जटा, न गंग, न नीलकंठ,
न आकार, न कोई अलंकार।
जो है, वही शिव का स्पंदन,
जो नहीं, वही उनका विस्तार।
जब “मैं” पिघलता है मौन में,
और “तू” भी ध्वनि से उतर जाता,
द्रष्टा–दृश्य का खेल सिमटकर
एक ही बिंदु में ठहर जाता।
न पूजक, न पूजा शेष,
न अर्पण, न स्वीकार,
जहाँ अनुभव भी छूट जाए,
वहीं प्रकटे शिव निर्विकार।
शिवरात्रि की यह गहन घड़ी,
निद्रा नहीं, जागरण है,
अहंकार की अंतिम राख से,
उदित आत्मा का दर्पण है।
जो शून्य में पूर्ण देख ले,
जो पूर्ण में शून्य उतार दे,
जो स्वयं को स्वयं में खो दे,
वही शिव को अंतर में आकार दे।
न निर्गुण अलग, न सगुण पृथक,
न साधक कोई, न साध्य हो,
एक ही चेतन लहर अनंत,
वही शिव, वही अद्वैत आराध्य हो।
वायु-सा छू ले हर उर-तार,
पर रहे स्वयं से भी पार,
जहाँ हर श्वास बने शिव का स्वर,
हम वहीं पाए शिव का विस्तार।
अनिल समीर-सा बहता रहे,
शिव-नाम सुवास में कहता रहे,
लेखक भी, साधक भी बनकर,
अंतर का आकाश गहता रहे।
अनिल आर्य...
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