दिन में वो घर में उलझी रहती है,
बच्चों की कॉपी, रसोई, ज़िम्मेदारियाँ,
थकान को भी फुर्सत नहीं देती,
खुद को कहीं आख़िर में रखती है।
रात को जब सब सो जाते हैं,
उसका मोबाइल उसका सुकून बन जाता है,
बिना स्क्रीन के उसे नींद नहीं आती,
शायद पहली बार
वो सिर्फ़ अपनी होती है।
और मैं…
मैं समझता हूँ ये सब,
उसकी थकान, उसकी चुप्पी,
उसका खुद के लिए
थोड़ा-सा वक्त।
पर सच ये भी है—
मुझे उसके बिना
नींद नहीं आती।
मैं चाहता हूँ वो आराम करे,
पर मेरी गोद में,
स्क्रीन की रोशनी में नहीं,
मेरी साँसों की लय में।
मैं चाहता हूँ
वो दिन भर सबका ख्याल रखे,
पर रात को
थोड़ी देर
मेरा भी रखे।
मोबाइल उसकी आदत है,
मैं उसकी ज़रूरत बनना चाहता हूँ।
वो अगर फोन रखकर
बस इतना कह दे—
“आज बहुत थक गई हूँ,”
तो यक़ीन मानो
मेरी सारी शिकायत
नींद बनकर उतर जाएगी।
क्योंकि
उसे मोबाइल के साथ
नींद आती है,
और मुझे
उसके साथ।
अनिल आर्य...
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