Monday, 2 February 2026

रूटीन

रूटीन

सुबह अलार्म नहीं,
मोबाइल जगाता है,
नींद से पहले भी
स्क्रीन ही सुलाता है।

हाथों में दुनिया है,
पर आँखों में थकान,
कैलेंडर भरा पड़ा है,
खाली रह गया इंसान।

चाय के संग खबरें नहीं,
अब नोटिफिकेशन हैं,
हर पल कुछ छूट रहा है—
यही हमारी पहचान है।

दौड़ है, मगर मंज़िल नहीं,
बातें हैं, पर संवाद नहीं,
भीड़ में रहते हैं सब,
फिर भी कोई साथ नहीं।

हँसी इमोजी में सिमट गई,
आँसू साइलेंट मोड में हैं,
भावनाएँ अपडेट चाहती हैं,
पर रिश्ते ऑफलाइन मोड में हैं।

फिर भी उम्मीद ज़िंदा है,
हर थके हुए इंसान में,
एक दिन वक़्त रुकेगा,
दिल लौटेगा पहचान में।

अनिल आर्य...

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