जिम्मेदारियों की आग में
वो हँसे तो लगता है, जैसे समय थम गया कहीं,
मैं अपने वक़्त के पहियों में, धूल सा उड़ता जा रहा हूँ।
उसकी आंखों में सुकून, मेरे दिल में बेचैनी,
मैं ख्वाबों की चाहत में, कसकर बंधता जा रहा हूँ।
वो कहे—"थोड़ा रुक जाओ, कुछ पल मेरे लिए,"
मैं "आगे बढ़ना ही है" के जाल में फँसता जा रहा हूँ।
उसकी बातें जैसे फूल, मेरे शब्द जैसे कांटे,
मैं जिम्मेदारियों की आग में, खुद ही झुलसता जा रहा हूँ।
उसकी बाहों की गर्मी, मेरे हाथों की ठंडक,
मैं कर्तव्यों की मशीन में, खुद को पीसता जा रहा हूँ।
मोहब्बत और ज़िम्मेदारी के इस अजीब समीकरण में,
मैं हर पल खुद को ढालता और बदलता जा रहा हूँ।
और फिर भी, हर रात उसके ख्यालों में खोकर,
मैं अपने अंदर की नर्मी को, धीरे-धीरे तलाशता जा रहा हूँ।
वो पास रहकर दूर सही, मगर उसकी दूर तक की यादें पास हैं,
मैं अपनी चाहत और फर्ज़ के बीच, धीरे-धीरे सुलगता जा रहा हूँ।
अनिल आर्य...
No comments:
Post a Comment