रिश्ते आवाज़ नहीं करते,
पर जब चुप हो जाते हैं
तो भीतर
बहुत कुछ टूटने लगता है।
माँ सुदेश—
थकी आँखों में भी
जो हमें पहले देखती है,
खुद को बाद में।
उसकी हर खामोश दुआ में
हमारी उम्र से बड़ा
त्याग छुपा है।
पिता बिरेन्द्र सिंह—
जिन्होंने कहा कम,
संभाला ज़्यादा।
जब जीवन डगमगाया,
तो उनका मौन
मेरी सबसे मज़बूत दीवार बन गया।
अनीता-रीतू और अमित,
रहते तो बहुत दूर हैं,
पर दिल के बहुत पास हैं,
इनसे अब बातें कम होती हैं,
इतनी कम
कि कई बार इनकी
आवाजें याद करके
दिल भर आता है।
दिन की आपाधापी में
संदेश अधूरे रह जाते हैं,
और हम—
एक-दूसरे से
थोड़ा पीछे छूट जाते हैं।
फिर भी
दर्द जब भीतर चुभता है,
तो सबसे पहले
इन्हीं के नाम उभरते हैं।
दूरी ने संवाद छीना है,
अपनापन नहीं।
रजनी—
मेरे हर बिखरे दिन की
जुड़ी हुई रात।
जहाँ आँसू भी
इजाज़त लेकर गिरते हैं,
और ख़ामोशी भी
समझी जाती है।
हर रिश्ते का
मान-सम्मान
इनको आता है,
थकती और रुकती है नहीं,
चेहरा हमेशा मुस्काता है।
अनायरा, पावनी
और रणविजय—
मेरी थकान की दवा,
मेरी हर बिन कही प्रार्थना का -
सुना गया उत्तर।
इनकी एक हँसी
जीवन को फिर से
संभालने लायक बना देती है।
रिश्ते इसलिए ज़रूरी नहीं
कि दुनिया क्या कहेगी,
रिश्ते इसलिए ज़रूरी हैं
कि इनके बिना
हम खुद को
खो देते हैं।
अगर कभी टूट जाओ
तो याद रखना—
दुनिया नहीं,
रिश्ते तुम्हें
फिर से जोड़ते हैं।
दुनिया जीत भी लो तो क्या,
अगर लौटने को
अपना घर न हो—
रिश्ते वही हैं
जो हार में भी
आपको इंसान बनाए रखते हैं।
अनिल आर्य...
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