अपना कौन...?
शादी के दिनों की रातें लंबी होती हैं,
नींद आँखों से पहले रिश्तों में अटक जाती है,
जिसे “अपना” कहा गया था बरसों से,
वो आज सिर्फ़ एन्जॉय करने आया है।
और जो सिर्फ इन्जॉय करने आया है,
उसके पास ब्याह बिगाड़ने के सब नुस्खे हैं,
वो चाय पे हंगामा करता है,
वो बिस्किट का बहाना धरता है,
और उसके पास,
अपनी बीमारी का एक नुस्खा भी नहीं है,
काम के वक़्त अचानक
कमर दर्द, घुटने की चोट,
पुराना सिर दर्द जाग जाता है,
कमाल की बात ये है कि,
एन्जॉय के वक्त ये सब भाग जाता है।
जैसे ही झाड़ू उठे-
ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है,
और प्लेट दिखे तो
डॉक्टर भी छुट्टी पर चला जाता है।
हाथ में प्लेट,
मुँह में ज्ञान,
बीमारी ऐसी
जो सिर्फ़ काम देखकर याद आए।
काम?
हाँ काम सै याद आया,
वो तो परिवार का संस्कार है-
मेहमानों का नहीं,
और कहने का परिवार,
कब मेहमान बन जाता है,
पता ही नहीं लगता।
कोई हँसते हुए फोटो खिंचवाता है,
कोई हर बात पर नुक्ता निकालता है,
शिकायतों की फेहरिस्त लंबी है,
पर हाथ… हाथ खाली हैं।
जो कुछ नहीं करते,
वही सबसे ज़्यादा थकान गिनाते हैं,
जो सिर्फ़ खाते हैं,
वही नमक कम ज़्यादा बताते हैं।
जो हर काम पे कह दे—
“मैं तो बीमार सूं,”
कमर टूट गई,
न चला जाता, न हिला जाताहै
पता नहीं कैसे,
नाचते हुए सबसे ज्यादा ठुमके लगाता है....
वो एन्जॉय में तो तगड़ा सै,
ज़िम्मेदारी में लाचार सै,
वो शरीर ते नहीं,
भाई वो तो
दिमाग़ ते बीमार सै।
और जो सच में अपने हैं—
वो बिना कहे, सुबह सबसे पहले उठते हैं,
बिना शोर किए काम सँभालते हैं,
डाँट भी खाते हैं,
ताने भी चुपचाप पी जाते हैं।
वो बीमार होकर भी दौड़ते हैं,
चाय ठंडी हो जाती है,
और ताने गरम झेलते हैं,
डाँट पहले उन्हें,
काम पहले उनसे,
और गलती भी उन्हीं की—
क्योंकि जिम्मेदारी उन्हीं की होती है।
न कोई ढिंढोरा,
न कोई शाबाशी की भूख,
बस एक मौन समझ—
“ये घर हमारा है,
इसे झुकने नहीं देंगे।”
उनकी खुशी,
सबके चेहरे की मुस्कान में घुल जाती है,
अपनी थकान
वो शादी की रौनक में दबा देते हैं।
यही तो फर्क है-
खून के रिश्ते और
पसीने के रिश्ते में।
खून का रिश्ता मान-सम्मान चाहता है,
और पसीने का रिश्ता डांट खाता है
और कहता है,
“जो करना है, मैं खुद कर लूँगा।”
जो ताने नहीं मारता,
जो काम गिनाता नहीं,
जो एन्जॉय से पहले ज़िम्मेदारी देखता है-
वही असली अपना है।
शादी में
खाना, गाना, फोटो सब होते हैं,
पर असली रिश्ता
थकान, नींद की कमी
और चुपचाप निभाए गए फ़र्ज़ में पहचाना जाता है।
निवेदन बस इतना है—
हर शादी में मेहमान कम,
ज़िम्मेदार इंसान ज़्यादा बनें।
अंत भला तभी हो सै भाई,
जब अपने लोग
काम भी करें,
डाँट भी खाएँ,
और फिर भी कहें—
“कोई बात ना, घर अपणा सै।”
अनिल आर्य...
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