और दिखावा भारी,
घर-परिवार वाले हाँगा लारे,
कार रे पूरी तैयारी,
कुर्सी हिली, बात बढ़ी,
रिश्तेदारी में जाग पड़ी।
ताऊ बोले— मान ना राखी,
ताई ने अपनी डिंग हांकी,
चाचा बोले— व्यवस्था ना सीखी,
चाची की थाली आधी फीकी।
मामा बोले— स्वागत है ठंडा,
मामी बोली— ना चले यो फंडा,
फूफा बोले— दाल में पानी,
फूफी बोली— ये क्या कहानी!
बुआ रूठी— फोटो कट गई,
मौसी बोली— चाय फट गई,
बड़ी मम्मी का सूट ना सिला,
छोटी मम्मी को बिस्कुट ना मिला।
जीजा का ब्रश ना पाया,
साली हँसती - हिलती काया,
साला लेट करता हर काम,
सालन नहीं करती आराम।
दूल्हा बैठा सेहरा ओढ़े,
दुल्हन लहंगा संभाले खड़ी,
घर वाले गिनते करते जाएँ—
किसकी भौंह कहाँ चढ़ी।
शादी ना रह गई अब संस्कार,
पूरा बन गया मेगा-प्रचार,
नखरे कम हों, हँसी हो ज़्यादा—
कोई न कोई रूठे यह करो इरादा।
अनिल आर्य...
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