मेरे भीतर
कुछ यूँ हलचल होती रहती है,
जैसे दुआ
ख़ुद को ढूँढ रही हो,
मुकाम ख़ुदको खोज रहा हो,
सब अंदर ही घट रहा है,
स्वयं-सफुर्त,
अपनी ही लय में,
जैसे मैं खुद को माध्यम पाता हूँ,
जोड़ने का,
अंतर को बाहर से,
सत्य को सुन्दर से,
मैं
सुनता हूँ,
आत्म के मौन को,
जानता हूँ
शून्य के विस्तार को,
झाँकता हूँ अंतर में,
बहुत उथल-पुथल में,
ढूंढता हूँ एक शांत जगह,
जहाँ कुछ तो है,
समझ के स्तर के ऊपर का,
जीवन के उस पार का,
लाइब्रेरी जैसा सा कुछ है,
जिसमें पढ़ने-समझने जैसा कुछ नहीं,
सिर्फ जुड़ना पड़ता है,
बहना पड़ता है,
बहाव के साथ।
मैं जुड़ता हूँ,
यह जुड़ाव बहुत मुश्किल है,
बहता हूँ,
यह बहाव बहुत छोटा होता है,
और अनायास होता है,
जहाँ कुछ प्रयास करता हूँ,
डूब जाता हूँ।
इसमें कनेक्शन मैं,
मैं बोलता कम हूँ,
सुनता ज्यादा,
प्रश्न नहीं पूछता
उत्तर सुनता हूँ,
उस जगह पर,
मैं, मैं नहीं रहता,
मैं शब्द उस विस्तार को
सीमित कर देता है,
तब,
मैं वो जगह बन जाता हूँ,
जहाँ आदमी
अपनी परतें उतार देता है।
मैं सिर्फ आईना नहीं बनता,
मैं साक्षात्कार बनता हूँ-
स्वयं से,
जो चेहरों से ज़्यादा
नीयतें पकड़ लेता है।
लोग मुझसे होकर गुज़रते हैं,
मुलाक़ात के लिए नहीं,
अपने बोझ को
हल्का करने के लिए।
मैं उधेड़ता हूँ,
परत दर परत,
और फिर बुनता हूँ,
एक - एक सलाई,
तोड़ता हूँ गढ़-मठ सांचे,
तराशता हूँ-
अंतर्मन की सच्चाई।
वो खुद से रिश्ता है मेरा,
बहुत करीब का,
बिना रस्म,
बिना किसी ऐलान के।
और ऊपर वाले से
बस इतनी सी दरख्वास्त,
की इस दुनिया में
हर किसी को देते हो जगह आप,
तो मेरे अंदर भी
मुझे थोड़ी सी वही
जगह दे देना…
जहाँ मिलें आप के साथ,
सुकून के दो पल,
व इतनी हिम्मत की हाथ
कितने भी जख़्मी हों,
मैं तराश दूँ हिमालय...
— अनिल आर्य
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